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Monday, August 6, 2012

जंतर मंतर से चला आन्दोलन हुआ छु मंतर अगस्त - क्रांति का या भ्रान्ति का ?


जंतर मंतर से चला आन्दोलन हुआ छु मंतर
              अगस्त - क्रांति का या भ्रान्ति का ?
किधर है हम और कहा जा रहे है ?
मंजिल तय नहीं बढे जा रहे है
भीड़ के नेता का तो है ठिकाना
आज इस भीड़ को छोड़
कल नई इक्कठा करने का
है अच्छा खासा तजुर्बा
भीड़ का हिस्सा न बन नासमझ बबलू
तू पीछे रह जायेगा अकेला
पहले भी मला है हाथ तुने अपना
फिर मलता रह जायेगा अकेला
 हंगामे तो होते रहेंगे इस देश में
आज कोई तो  कल कोई और करेगा
भुगतना तो प्यारे हमें ही पड़ेगा

जंतर मंतर से चला आन्दोलन छु मंतर. बात तो थी कि जनता का मत, सुझाव लेकर आगे कि दिशा निर्धारित करेंगे मगर  मंच से तो टीम अन्ना के वक्ताओ ने अधूरे होम वर्क के बावजूद अपने राजनितिक दल के स्वरुप , ध्येय  और मंतव्य को बता ही दिया. जनता के विचारो का इंतजार किये बिना. हो सकता है कि देश की जनता ने ईमेल द्वारा बता दिया होगा. अब यह सोसिअल आन्दोलन राजनीतिक पार्टी बन चूका है. आगे आगे देखिये होता है क्या ? इन्हें कुछ हासिल हो या नहीं यह गर्त में है मगर यह तय है की अगले चुनावो में अन्ना की राजनितिक टीम दूसरी पार्टियों के प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक की प्रक्रिया में खुजली तो कर ही देंगे.
 अभी इलेक्ट्रोनिक मीडिया  में अन्ना की सोसिअल एक्टिविटी से राजनीति की पदयात्रा के प्रारंभ होने से लेकर उसके भविष्य को लेकर चिन्तक समूह अपने अपने विचारो से दर्शको का ज्ञानार्जन कर रहे है. अपनी सोच को तथ्यों से जोड़कर नफा नुकसान का गणित कर रहे है और कही दबे स्वरों में यह भी उभर कर आ रहा है यह  राजनीति ठीक नहीं है. तभी तो हर कोई यह प्रश्न दागता है है की क्या गारंटी है की टीम अन्ना स्वच्छ रह पायेगी ? इसका मतलब यही निकलता है की राजनिती कुल मिलकर गड़बड़ ही है. अब इसमें क्या राजनीति है यह तो समय ही बतलायेगा. टीम अन्ना भंग और राजनितिक दल के गठन की कठिन राह पर  अधूरे होम वर्क से  सफ़र शुरू करने की तैयारी कहाँ ले जाएगी पता नहीं.

अगस्त माह की अपनी महत्ता है. दोहराने से कोई फायदा नहीं. हमने  अपना भू-भाग देकर अपने को आजाद किया जिस मंतव्य से दिया उसका खामियाजा अभी भी भुगत रहे है. पाक की नापाक हरकते बदस्तूर जारी सीमा पार से और अन्दर भी.    अगले सप्ताह से आपको हर चैनल पर स्वाधीनता दिवस की धूम दिखाई  देगी.  १६ अगस्त के बाद फिर कुछ नहीं दिखाई देगा राष्ट्रीयता से जुड़ा कोई क्रायक्रम या फिर बहस कि आजादी के इतने वर्षों में हमने क्या हासिल किया और क्या नहीं. अल्पसंख्यक दलित न जाने कितनी श्रेणिया हमारे राजनीतिज्ञों ने बना रखी है उनको क्या मिला क्या नहीं इसका भी गणित निकाल लिया जायेगा. सिर्फ समसामयिक रह गया है स्वाधीनता दिवस / गणतंत्र दिवस जब हम चंद घंटो में पूरा पुनरावलोकन कर लेते है. हाँ इसमें "मिलते है ब्रेक के बाद" वाला समय भी शामिल है. 

देश की जनता को तो इस तरह हमारे सिस्टम ने व्यस्त कर रखा है की उसको अपने अलावा कुछ दिखाई नहीं देता है और जो कोई राष्ट्र की चिंता करता दिखाई देता है वह सेकुलर करार दे दिया जाता है. अब करे तो भी क्या करे इसी उदेड्बुन में है सब. स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को तो सरकार और हम बस इन्ही दिन याद कर पाते है . बाकी वक्त ही कहाँ मिल पाता है. न तो सरकारी योजनाओ के नामकरण में शहीद  याद आते है न ही और कभी. अधिकतर योजनाये गाँधी सरनेम पर आधारित ही है. अब जैसा भी है जिसकी चलेगी वह अपनी ही चलाएगा. सरकार भी जनता की मानसिकता को अच्छी तरह पहचान  चुकी है. आजादी के ६५ वर्षों की लम्बी यात्रा पूरी कर चुके है मगर देश बुनियादी तौर पर मजबूत है कहाँ ? राजनीति या कहे तुष्टिकरण की राजनीति ने देश को खोकला कर रखा है. न अन्दर से हम सुरक्षित है न सीमाओ के पार से. नेपाल बंगलादेश और श्रीलंका अब कहा मित्रवत रहे है ? चीन और पाक से छतीस का आंकड़ा जग जाहिर है ही . कसाब और अजमल पूर्णतया सुरक्षित रूप से  आनंद में है ही. केंसर पीड़ित साध्वी की खबर कभी कभी आ जाती है .
स्वाधीनता दिवस फिर मना लेंगे मगर वास्तव में हम कहा है यह फिर अनुतरित रह जायेगा.

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