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Monday, January 21, 2013

चिंतन शिविर से गृहमंत्री का चिंतन बाहर आया

चिंतन शिविर से गृहमंत्री का चिंतन बाहर आया -- प्रफुल्ल मेहता 

कांग्रेस के चिंतन शिविर में देश के गृह मंत्री का चिंतन बाहर  आया 
भारत के गृहमंत्री का चिंतन बाहर आ ही गया . हिन्दू आतंकवाद की चिंता कर रहे थे जयपुर में। सही भी है तुष्टिकरण की बुनियाद पर टिकी पार्टी के होने के कारण पार्टी अध्यक्षा  एवं नए उपाध्यक्ष के सामने अपनी इमेज कौन नहीं बनाना चाहेगा। चिंतन शिविर के मंथन से अमृत निकलने की गुंजाईश तो थी ही कहा इसलिए विष ही निकला। इधर हिन्दुओ का महाकुम्भ चल रहा है और देश के गृहमंत्री को हिन्दू आतंक  वादी नजर आने लगा है। और तो और वह भी राष्ट्रवादी विचारो के संघठन यथा भाजपा तथा संघ ,में तैयार हो रहे है ..शिंदे ने खुफिया सूचनाओं के आधार पर ये खुलासा किया है। ( http://khabar.ibnlive.in.com/news/90043/12/4)
 
शिंदे ने आरएसएस और बीजेपी पर हिन्दू आतंकवाद को बढ़ावा देने और ट्रेनिंग कैंप चलाने का आरोप लगाया है। शिंदे ने बीजेपी पर समाज में जहर घोलने का भी आरोप लगाया है। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने गृहमंत्री के बयान से सहमति जताई है।कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी का कहना है कि अगर शिंदे ऐसा बयान दिया है तो उनके जरूर कोई सबूत होगा। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सुशील कुमार शिंदे के बयान को सही ठहराया है।
दिग्विजय जी, ज़नाब राशीद  अल्वी और भी  होंगे जो हाँ में हाँ इक सुर में मिलायेंगे। और इस सुर को फिर टीआरपी के चक्कर में इलेक्ट्रोनिक मीडिया तान दे ही देगा।
 
देश की सुरक्षा का ख्याल गृहमंत्री जी को ही तो रखना है यह उनकी जिम्मेदारी है , और जिम्मेदारी ठीक से निभा ले इसलिए सरकार ने उनको कई सुविधाए भी दी है। देश के गृह मंत्री बोलते  हे मतलब हकीकत तथ्यात्मक इनसे दूर हो ही  नहि सकते। उन्होंने फ़रमाया वो शत प्रतिशत सही होगा। ऐसा  खुद उनकी पार्टी के ही रशीद अल्वी जी भी फरमा  रहे थे। 
 
 
शिंदे से दुरी रखने वाले कोंग्रेस  के कुछ नेता यह समझा रहे होंगे की आखिर क्या जरुरत आन पड़ी की ऐसा वक्तव्य उस समय दिया जब सभी अपने चेनलो पर राहुल राहुल चल रहा था। बीच में ही गड़बड़ हो गई . शिंदे ऊपर राहुल बाबा दुसरे नम्बर पर। 
 
खैर बात सिर्फ इतनी है की गृह मंत्री जी किसी जनसभा में नहीं अपनी पार्टी के मंच से पार्टी के अधिवेशन में बोल रहे थे। देश की जनता भी उनसे सवाल पूछेगी ?  कही तथ्यात्मक सबूत  है तो फिर हिन्दू आतंकवाद को बढ़ावा देने में लिप्त है क्या गृह मंत्री जी जिन्होंने सबूत   होते हुए ( अल्वी जी ने तथा दिग्विजय जी ने भी सुर में सुर मिलाया है)  अभी तक कोई कड़ी कार्यवाही नहीं की।
 
बयान भी क्या चीज है  उधर मैं टीआरपी की चिंता बता रहा था और इधर मेरे विचारो को कम शब्दों मे  बांधना मुश्किल। चक्कर  मे मैं भी और चक्कर में देश के गृह  मं����्री शिंदे जी भी . बीजेपी और आएसएस के कैंपों में आतंक की ट्रेनिंग दी जाती है. भरी सभा में ये बात कहने के बाद गृह मंत्री शिंदे बाहर आते ही मुकर भी गए. उन्होंने कहा कि मैंने हिंदू नहीं, भगवा आतंक के बारे में कहा था
असमंजस में हूँ  क्या लिखू मीडिया  ने पहले कुछ और कहते सुनाया  और फिर कुछ और। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के गृहमंत्री यह कह कर के कि  मीडिया में पहले भी आया है उसी को मैंने दोहराया है अपने गैर जिम्मेदाराना बयान से कन्नी काटना चाहते है वह उचित नहीं लगता। मीडिया के कहने पर उसकी जाँच पड़ताल किये बिना देश के गृह मंत्री का बयान  आना क्या उचित है ? बयानों से बवाल मचाना अब देश के नेताओं का शायद शौक बनने  लगा है। मगर देश के लोकतान्त्रिक परम्पराओ  के अनुकूल यह नहीं है।
गृह मंत्री के इस बयान  की जाँच होनी चाहिए और दोषी को  सजा मिलनी ही चाहिए। फिर चाहे वो गलतबयानी करनेवाला हो या दूसरा पक्ष बकौल गृह मंत्री केम्प लगाने वाले संघ या फिर भाजपा । और वह भी फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से जैसे की दामिनी के केस में चल रहा है . तभी अनर्गल दोषारोपण के कारण  विषमय हो रहा देश का वातावरण स्वच्छ रह पायेगा।

 मुझे तो लगता है गैर जिम्मेदराना काम किसका है इस पर एक आयोग बैठ ही जायेगा अगर भाजपा ने ज्यादा विरोध किया तो,मतलब साफ़ होना जाना कुछ नहीं यह लोकतंत्र है।  संघ का वक्तव्य  अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन जी वैध्य  ने दिया है। मनमोहन वैध्य  ने कहा है की हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग करना अत्यंत अनुचित और आपत्तिजनक है. हम इसकी घोर भर्त्सना करते हैं. आतंकवाद आतंकवादहै. उसे हिंदू या अन्य किसी धर्म के साथ जोड़ना उचित नहीं है. गृहमंत्री ने आतंकवाद की जिन घटनाओं का उल्लेख किया है उनकी अभी भी जाँच चल रही है. ऐसे में गृहमंत्री ने ऐसे बयान देना जाँच प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास है जो आपत्तिजनक है. जिहादी आतंकवाद पर काबू पाने में अपनी असफलता को ढँकने के प्रयास में कांग्रेस सरकार ऐसे राजकीय बयान पहले भी देते आई है.अकबरुद्दीन ओवैसी के प्रक्षोभक एवं देश विरोधी बयान के पुख्ता सबूत होने के बाद भीसरकार करवाई करने से कतरा रही थी. जनता के दबाव और न्यायालय के आदेश के बाद  उन्हें करवाई करनी पड़ी. अफजल गुरु की फांसी की सजा सर्वोच्च न्यायालय ने कायम करने के बाद भी उसपर अमल नहीं हो रहा है. ऐसी नाकामियों को छिपाने के लिए गृहमंत्री ऐसे राजकीय बयान दे रहे है
देखते है चिंतन के कौन कौन से राज आने वाले समय में बाहर  आयेंगे .

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Tuesday, January 8, 2013

पाक की नापाक हरकत - कब तक सहन करनी होगी ?



पाक की नापाक हरकत - कब तक सहन करनी होगी ?
प्रफुल्ल मेहता
खबर जब पढ़ी तो रूह कांप उठी। न घर की चिंता न खुद की चिंता, सिर्फ देश की 24 घंटे रक्षा सिर्फ यही एक जज्बा हैं हमारे जवानो का। हमारे जवानो की न्रशंस हत्या कर उनका मस्तक ले गए . मस्तक सिर्फ उनका नहीं हर हिंदुस्तानी का प्रतीक था। . मगर इस नाकाम पंगु सरकार के हाथों  तो यही हश्र लग रहा हैं जो हमारे जाबांज जवानों के संग हुआ है।
मेरे मन में  इक ख्याल आया है की इस लोकतान्त्रिक देश की सर्वोच्च संस्था लोक सभा एवं राज्य सभा के सभी सदस्यों को अनिवार्य रूप से सियाचीन, जैसलमेर, बाड़मेर,बांग्लादेश की सीमाओ  पर 15-15 दिन के प्रवास तय करने चाहिए और वैसे ही रहे जैसे की जवान सीमा पर रहते है  ताकि जवानो को भी लगे की नेतागण भी राष्ट्र सुरक्षा में बराबरी का जोखिम उठा रहे है।

पाकिस्तान की यह नापाक हरकत इसका तुरन्त मुहँ  तोड़ जवाब देना चाहिए था। दुश्मन को जब तक दुश्मन नहीं समझेंगे और तुष्टिकरण से मोहभंग नहीं होगा तब तक पाक की नापाक कारगुजारियाँ  हमें युहीं झेलने पड़ेगी .और इसका दूरगामी परिणाम  झेलना पड़ेगा। इस दूरगामी परिणाम की  झलके मुंबई के साथ साथ पुरे देश में हुए प्रदर्शन जिसमे लखनऊ में मूर्ति पर हमला , मुम्बई  में शहीद स्मारक पर लात मारते हुए चित्र सामने आये है,   अकबरुद्दीन ओवेशी के  हाल में ही दिए बयां में झलक रही है। इस समय भी राष्ट्र नहीं चेता तो संकट गंभीर हो सकता है।
क्रिकेट मैच , समझौता  एक्सप्रेस या फिर थार एक्सप्रेस चला कर हमें क्या हासिल होगा . इतिहास  गवाह है की  हिंदुस्तान से पाकिस्तान के अलग होने के बाद से ही उसका दोस्ताना सिर्फ दिखावा और छल  कपट से भरा ही रहा है। जहरीला नाग भी इसके सामने तुच्छ  है।
हमारी विदेश नीति के ठुलमुल रवैये से ही पाकिस्तान दिन ब दिन  नापाक हरकते करने से बाज नहीं आया है।
देश के नेताओ से आग्रह है की देश के संप्रभुता से खिलवाड़ करने वालो के साथ किसी तरह की कोताही नहीं बरती जाये। अब देश का युवा जाग उठा है , कही ऐसा न हो जाये की देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने वाले ऐसे नेताओ को खुद अपनी पहचान खोनी पड  जाये।
मुझे तो लगता है की, जाग उठा इस देश का युवा इन दो शहीदों को श्रधांजलि देने की इक नई  मिसाल इण्डिया गेट से शुरू करेगा जो देश के हर कोने तक चलेगा। सीमा पर हमारे जवानो की होसला अफजाई के लिए हमें अपना राष्ट्र धर्म निभाना ही होगा।
वन्देमातरम !

Monday, January 7, 2013

मिडिया इण्डिया का है मिडिया भारत का बने

मिडिया इण्डिया का  है मिडिया भारत का बने 
व्यर्थ विवाद  आखिर क्या चाहती है मीडिया ?
क्यों स्वयं अपनी विश्वनीयता खोने में लगी है मीडिया ?
 

भ्रम के सहारे टी आर पी (TRP) बढ़ाने में लगे मीडिया पर कौन यकीन करता है ? दिन भर एक ही झूट को बार बार दिखला कर सच में बदलने का कुत्सित प्रयास सफल होता है क्या? सत्य को तोड़ मरोड़ कर परोसना क्या यही है पत्रकारिता ? यह कुछ सवाल है जो अक्सर सभी के मन में उठते रहते है.
यह तो साफ़ नज़र आने लगा है कि कुछ मीडिया हाउसेस का एकत्रीकरण संघ के विरुद्ध ही है तभी तो सिर्फ एक नज़र से ही वो इसको आंकते है . अपनी पूरी नेगेटिव एनर्जी दम खम  से लगा लेते है बस एक मौका मिलना चाहिए। तुष्टिकरण की राजनीती में लिप्त दलों के नेताओं की तो जैसे बांछे खिल उठती है। क्या तो एंकर और क्या पैनल में डिस्कशन करने वाले सभी अपने अपने ढंग से छोटे परदे में छाने  की होड़ में लगे रहते है। शायद इन कृत्यों से कही पुरस्कृत हो ही जाये।
कुछ समाचार पत्रों और चेनलो में तो न जाने बेसिर पैर क्या क्या लिख डाला जबकि मोहन भागवत  जी ने ऐसा कुछ कहा ही नहीं की बवाल मच जाये।  मोहन जी भागवत ने जो कहा  वह यू ट्यूब पर भी उपलब्ध है उसका आलेख कई ब्लॉग अथवा वेब साइट्स पर भी उपलब्ध है। सत्य तो शायद मीडिया को दिखलाना ही नहीं है शायद यह उन्होंने तय कर रखा है।
मिडिया ने इंडिया  और भारत की व्याख्या अपने हिसाब से कर डाली इण्डिया को शहर और भारत को गाँव तक सिमित कर डाला, क्योंकि इसी तरह वो सही कथन का पोस्टमार्टम अपने हिसाब से कर पाते. अरे मीडिया के भाइयो गाँव से आगे वनवासी क्षेत्र भी है जहाँ तक शायद  पहुँच ही नहीं है या फिर वहाँ  पहुच कर भी टी आर पी नहीं बढती इसलिए आप वहां जाना नहीं चाहते।

कुछ खबरे जो समाचार पत्रों में छपी  उनकी बात करे और जो मोहन जी भागवत  ने कहा उसकी सत्यता से मिलान  करे तो दूध का दुध  और पानी का पानी अलग हो जायेगा।

न्यूज़ डाट गूगल डाट कॉम से कुछ खबरे ली और उसकी मोहन जी भागवत के कथन से मिलान करने का प्रयास देखिये
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आंकड़े बताते हैं, कितने गलत हैं RSS प्रमुख मोहन भागवत के विचार : नवभारत टाइम्स आगे लिखता है की ...इसी क्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन राव भागवत ने कहा था कि रेप की घटनाएं गांवों के मुकाबले शहरों में ज्यादा होती हैं। भागवत ने कहा था कि रेप की घटनाएं 'इंडिया' में ज्यादा और 'भारत' में कम होती हैं। लेकिन, रेप की घटनाओं के आंकड़ों को देख कर लग रहा है कि भागवत के न सिर्फ विचार गलत हैं, बल्कि वह सरासर 'झूठ' बोल रहे हैं।
भागवत ने की विवादित टिप्पणी, गृह सचिव ने की आलोचना एनडीटीवी खबर  नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को अपनी उस टिप्पणी से एक विवाद को जन्म दे दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय शहरों में पाश्चात्यीकरण, बढ़ रहे अपराधों का कारण है। केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने भागवत की इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फर्क करने का कोई आधार नहीं है।
नई दिल्ली: दिल्ली गैंगरेप के मसले पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख के मोहन राव भागवत ने कहा है कि रेप की घटनाएं गांवों के मुकाबले शहरों में ज्यादा होती है। उन्होंने इस मसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शहरों में ज्यादा बलात्कार होते हैं और गांवों में रेप की घटनाएं कम होती है। उन्होंने इसके पीछे शहरों में पश्चिमी सभ्यता के हावी होने को कारण बताया। उन्होंने कहा कि पश्चिम सभ्यता का ही असर है कि रेप भारत में नहीं बल्कि इंडिया में होते हैं।
......कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि मोहन भागवत और कैलाश विजयवर्गीय को तत्काल इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि पता नहीं किस देश और समाज में यह लोग रहते हैं। अफसोस भागवत को इंडिया और भारत के बीच का अंतर नहीं पता। ........
सिलचर(असम)। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और बलात्कार जैसे मामलों पर विवादास्पद बयान दिया है। मोहन भागवत ने कहा है कि रेप जैसी घटनाएं गांवों की तुलना में शहरी इलाकों में ज्यादा होती है और इसकी वजह पश्चिमी सभ्यता का असर है। संघ प्रमुख ने कहा है कि रेप भारत में कम और इंडिया में ज्यादा होती है। भागवत के इस बयान पर कांग्रेस सहित कई पार्टियों ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की।
केंद्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत की उस टिप्पणी की आलोचना की है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय शहरों में पाश्चात्यीकरण, बढ़ रहे अपराधों का कारण है. सिंह ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फर्क करने का कोई आधार नहीं है. गृह सचिव, सिंह ने यहां एक कार्यक्रम के इतर मौके पर कहा कि इंडिया और भारत के बीच फर्क बताने का कोई आधार नहीं है.
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को अपनी उस टिप्पणी से एक विवाद को जन्म दे दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय शहरों में पाश्चात्यीकरण, बढ़ रहे अपराधों का कारण है. कांग्रेस ने भागवत की इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फर्क करने का कोई आधार नहीं है. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, "इससे आरएसएस की मानसिकता जाहिर होती है. मोहन भागवत वही कह रहे हैं." उन्होंने आगे कहा, "मोहन भागवत का बयान उनकी मानसिकता का दिखाता है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान से विवाद पैदा हो गया है जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा है कि शहरों में ज्यादा बलात्कार होते हैं और गांवों में रेप की घटनाएं कम होती है. भागवत का कहना था कि शहरों में पश्चिमी सभ्यता का काफी असर है. खबरों के अनुसार हाल के अपने सिलचर दौरे के दौरान उन्होंने कथित तौर पर कहा, ''इस तरह के अपराध भारत में कम होते हैं और इंडिया में अधिक होते हैं.'' खबरों के मुताबिक उन्होंने इसका विवरण देते हुए कहा, ''आप देश के गांवों और जंगलों में देखें जहां कोई सामूहिक बलात्कार या यौन अपराध की घटनाएं नहीं होतीं. यह शहरी इलाकों में होते हैं
मोहन जी भागवत ने एक कार्यक्रम में असम के सिल्चर में प्रबुद्ध नागरिकों के साथ हुए वार्तालाप कार्यक्रम में उपस्थित एक सज्जन ने डा. भागवत से प्रश्न पूछा‘‘ये जो इंडिया में आजकल जो अट्रॉसिटीज अगेन्स्ट विमेन, रेप्स, मॉलेस्टेशन बढ़ रहे है, इनमें हिंदुओंपर ज्यादा अत्याचार होते दिख रहे है। यह हिन्दुओंका मानोबल नष्ट करने का प्रयास लग रहा है। इसके संदर्भ में आपके क्या विचार हैं?’’
इस प्रश्न के उत्तर में डा. भागवत ने कहा – ‘‘इंडिया में जो यह घट रहा है, बढ़ रहा है वह बहुत खतरनाक और अश्लाघ्य है। लेकिन ये भारत में नहीं है। यह इंडिया में है। जहां इंडिया नहीं है, केवल भारत है वहां ये बातें नही होती, आज भी। जिसने भारत से नाता तोड़ा उसका यह हुआ। क्योंकि यह होने के पीछे अनेक कारण हैं। उसमें एक प्रमुख कारण यह भी है कि हम मानवता को भूल गये, संस्कारों को भूल गये। मानवता, संस्कार पुस्तकों से नहीं आते, परंपरा से आते हैं। लालन-पालन से मिलते हैं, परिवार से मिलते है, परिवार में हम क्या सिखाते है उससे मिलते हैं।
अब इसमें न तो शहर और गाँव की बात नज़र आती है मिडिया ने कहाँ  से ली यह तो उनसे बेहतर कौन समझा और बता सकता है।
मिडिया को यह नज़र नहीं आया न ही उन्होंने जहमत उठाई की एक बार उनके वक्तव्य को पूर्ण रूप से पढ़ सुन लेते। भागवत जी ने कहा कि हमारे यहां ऐसा नहीं है। हम कहते हैं  कि  महिला  जगज्जननी है। कन्याभोजन होता है हमारे यहां, क्योंकि वह जगज्जननी है। आज भी उत्तर भारत में कन्याओंको पैर छूने नहीं देते, क्योंकि वह जगज्जननी का रूप है। उल्टे उनके पैर छुए जाते हैं। बड़े-बड़े नेता भी ऐसा करते हैं। उनके सामने कोई नमस्कार करने आए तो मना कर देते हैं,स्वयं झुक कर नमस्कार करते हैं। वो हिंदुत्त्ववादी नहीं है। फिर भी ऐसा करते हैं। क्योंकि यह परिवार के संस्कार हैं। अब यह संस्कार  आज के तथाकथित एफ्लुएन्ट परिवार में नहीं हैं। वहां तो करिअरिझम है। पैसा कमाओ, पैसा कमाओ। बाकी किसी चीज से कोई लेना-देना नहीं। 
मिडिया ने कही भी उपरोक्त कथन का जिक्र नहीं किया .
भागवत  ने यह भी कहा :
बिना संस्कार कानून असरदार नहीं
 कानून और व्यवस्था अगर चलनी है, उसके लिए मनुष्य पापभीरू होना है, तो उसके लिए संस्कारोंका होना जरूरी है। अपने संस्कृति के संस्कारों को हमें जल्द जीवित करना पड़ेगा। शिक्षा में कर लेंगे  तो परिस्थिति बदल पाएंगे। तब तक के लिए कड़े कानून, कड़ी सजाएं आवश्यक है।  दण्ड हमेशा होना चाहिए शासन के हाथों में और वह ठीक दिशा में चलना चाहिए। वह इन सबका प्रोटेस्ट करने वालों पर नहीं चलना चहिए। उसके लिए उनका संस्कार भी आवश्यक है। वो वातावरण से मिलता है। पर वो भी आज नहीं है। हम यह करें तो इस समस्या का समाधान पा सकते हैं।
मातृशक्ति है भोगवस्तु नहीं
हमारी महिलाओं की ओर देखने की दृष्टि वे मातृशक्ति है यही है। वे भोगवस्तु नहीं,देवी हैं। प्रकृति की निर्मात्री है। हम सब लोगों की चेतना की प्रेरक शक्ति है और हमारे लिए सबकुछ देनेवाली माता है। यह दृष्टि जब तक हम सबमें लाते नहीं तब तक ये बातें रुकेगी नहीं। केवल कानून बनाने से काम नहीं चलेगा। वो होना चाहिए किन्तु उसके साथ संस्कार भी होने चाहिए।’’
न्यूज़ रूम में बैठकर कहना और हकीकत में बहुत बड़ा फर्क है यह शायद अब सब जान लेंगे।
मीडिया को ओवेशी का बयान शायद नज़र नहीं आया . सलाहुद्दीन ओवेसी के पुत्र अकबरुद्दीन अली ओवेसी के हिन्दुओ के प्रति दिए वकतव्य के बारे में मिडिया को शायद दिखाई और सुनाई  नहीं देता। वर्ना यह तो ऐसा इश्यु है कई कई दिन का मसाला टी आर पी के लिए मिल जाता। शायद तुष्टिकरण का असर इन पर भी हावी हो गया है।
संघ भी है की इनकी परवाह किये बिना निरंतर अपने उधेश्य की और आगे बढ़ने में लगा है
मीडिया के लिए बहुत कुछ करने को है  इस देश में। देशभक्ति का ज्वार  उठा सकती है मीडिया। पॉजिटिव एनर्जी लगनी चाहिए अपने कार्यक्रमों में .  
मिडिया से करबद्ध आग्रह कि  आप भी भारत के बनो इण्डिया के नहीं। भावो को समझो और समझाओ बिगाड़ो नहीं।