Tuesday, March 19, 2013

कैसे खेलु मैं होली किसके संग खेलु होली ? कौनसे रंगों से खेलु मैं होली ?

कैसे खेलु मैं होली किसके संग  खेलु  होली ? कौनसे रंगों से खेलु मैं होली ? 

फिर होली का त्यौहार सामने नज़र आने लगा है . मन है कि  मान ही नहीं रहा है . जरा भी इच्छा नहीं है किसी को बदरंग करने की और होगा भी कैसे आम इन्सान भला कैसे किसी को बदरंग कर सकता है वो तो खुद बदरंग होने को बना है . पहले से ही कई रंगों से बदरंग है. महंगाई के रंग  ने त्यौहार पर  अपनी अमिट  छाप छोड़ ही रखी है. अब कहा वो वेरायटी वाले पकवानों की खुशबु। एक दो आइटम से रंग जमाना  पड़ता है. 

हाँ, भ्रस्टाचार  के रंग के ऊपर कोई और रंग चढ़ा है भला. आये दिन भ्रस्टाचार  की बौछारो के आगे अपनी पिचकारी भला कहाँ टिकेगी  ? भ्रस्टाचारियों की पिचकारी की मार आम आदमी को पड़ती है,  जनता का  रंग  भ्रस्टाचार की  पिचकारी की मार से कैसे  अछूत  रह सकता है भला . 

समझ में आज तक नहीं आया कि श्वेत वस्त्र धारियों पर आज तक राष्ट्र रंग क्यों न चढ़ा ?  श्वेत वस्त्रो की चमक भ्रस्टाचार के रंग से और खिल उठती है चेहरी की चमक तो फीकी होने का सवाल ही नही . 

कौनसे मैदान में यह खेल रहे है देश से होली आज तक समझ नहीं पाया हूँ मैं ? इस चिंता से ही शायद मेरा फीका रंग आज भी कायम है. मगर इन नेताओ को भल्ला मेरी या फिर मेरी जनता की तनिक भी चिंता है ? देश का या फिर जनता का रंग भले ही उड़ा  रहे बस इनका रंग नहीं उड़ना चाहिए .  

राष्ट्र की संप्रभुता के लिए अपना सिर न्योछावर  कर दे उस  के यहाँ होली के रंग के गुबार नहीं  होंगे तो क्या हुआ ? श्वेत  वस्त्र धारियों के यहाँ तो होली का मजमा  लगेगा ही, चंग पर थाप लगेगी ढोलक पर ठुमका लगेगा भंग छनेगी . जनता का क्या उसके रंग की किसको चिंता ? 

दामिनी आन्दोलन का रंग भी अब उड़ने लगा है। श्वेत वस्त्रधारियों के पास तो रंगों का खजाना है। इक रंग से जरा बदरंग होने का भय लगता है तो दूसरा रंग तैयार है . भला हो भगवन का की १६  की बजाय  १८  की सध्बुधी   का रंग जम  गया। वर्ना बचपन के  बदरंग होने का पूरा इंतजाम इन्होने कर ही रखा था  . 

समय जब आएगा चुनावो का तब उस रंग में रंग जायेंगे आश्वासनों की पिचकारी की बौछारो  से फिर वोटर को सराबोर कर देंगे . भोला भाला  वोटर आश्वानो की बौछारो की मार से फिर मारा  जायेगा। यह होली चली जाएगी और फिर एक वर्ष बाद सपनों के नए रंगों को लेकर आएगी। 

Tuesday, January 8, 2013

पाक की नापाक हरकत - कब तक सहन करनी होगी ?



पाक की नापाक हरकत - कब तक सहन करनी होगी ?
प्रफुल्ल मेहता
खबर जब पढ़ी तो रूह कांप उठी। न घर की चिंता न खुद की चिंता, सिर्फ देश की 24 घंटे रक्षा सिर्फ यही एक जज्बा हैं हमारे जवानो का। हमारे जवानो की न्रशंस हत्या कर उनका मस्तक ले गए . मस्तक सिर्फ उनका नहीं हर हिंदुस्तानी का प्रतीक था। . मगर इस नाकाम पंगु सरकार के हाथों  तो यही हश्र लग रहा हैं जो हमारे जाबांज जवानों के संग हुआ है।
मेरे मन में  इक ख्याल आया है की इस लोकतान्त्रिक देश की सर्वोच्च संस्था लोक सभा एवं राज्य सभा के सभी सदस्यों को अनिवार्य रूप से सियाचीन, जैसलमेर, बाड़मेर,बांग्लादेश की सीमाओ  पर 15-15 दिन के प्रवास तय करने चाहिए और वैसे ही रहे जैसे की जवान सीमा पर रहते है  ताकि जवानो को भी लगे की नेतागण भी राष्ट्र सुरक्षा में बराबरी का जोखिम उठा रहे है।

पाकिस्तान की यह नापाक हरकत इसका तुरन्त मुहँ  तोड़ जवाब देना चाहिए था। दुश्मन को जब तक दुश्मन नहीं समझेंगे और तुष्टिकरण से मोहभंग नहीं होगा तब तक पाक की नापाक कारगुजारियाँ  हमें युहीं झेलने पड़ेगी .और इसका दूरगामी परिणाम  झेलना पड़ेगा। इस दूरगामी परिणाम की  झलके मुंबई के साथ साथ पुरे देश में हुए प्रदर्शन जिसमे लखनऊ में मूर्ति पर हमला , मुम्बई  में शहीद स्मारक पर लात मारते हुए चित्र सामने आये है,   अकबरुद्दीन ओवेशी के  हाल में ही दिए बयां में झलक रही है। इस समय भी राष्ट्र नहीं चेता तो संकट गंभीर हो सकता है।
क्रिकेट मैच , समझौता  एक्सप्रेस या फिर थार एक्सप्रेस चला कर हमें क्या हासिल होगा . इतिहास  गवाह है की  हिंदुस्तान से पाकिस्तान के अलग होने के बाद से ही उसका दोस्ताना सिर्फ दिखावा और छल  कपट से भरा ही रहा है। जहरीला नाग भी इसके सामने तुच्छ  है।
हमारी विदेश नीति के ठुलमुल रवैये से ही पाकिस्तान दिन ब दिन  नापाक हरकते करने से बाज नहीं आया है।
देश के नेताओ से आग्रह है की देश के संप्रभुता से खिलवाड़ करने वालो के साथ किसी तरह की कोताही नहीं बरती जाये। अब देश का युवा जाग उठा है , कही ऐसा न हो जाये की देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने वाले ऐसे नेताओ को खुद अपनी पहचान खोनी पड  जाये।
मुझे तो लगता है की, जाग उठा इस देश का युवा इन दो शहीदों को श्रधांजलि देने की इक नई  मिसाल इण्डिया गेट से शुरू करेगा जो देश के हर कोने तक चलेगा। सीमा पर हमारे जवानो की होसला अफजाई के लिए हमें अपना राष्ट्र धर्म निभाना ही होगा।
वन्देमातरम !

Friday, December 28, 2012

बिटिया देश को जगाकर सो गई ..........

बिटिया  देश को जगाकर सो गई
माँ की लाडली हमेशा के लिए खो गई 

युवाओं  ने भी ली है अब अंगड़ाई
तय कर बैठे है की लड़ेंगे हक़ की लड़ाई 

मौत तेरी यह व्यर्थ अब न  जायेगी 
हुक्मरानों से जनता अब हिसाब मांगेगी 

सुधर जाओ समझ जाओ सत्ता के ठेकेदारों
देख के यह हालात  देश अब उठ खड़ा है
युवा देश का अब हालात से लड़ने लगा है

Saturday, December 22, 2012

दूसरा एंगल - युवा शक्ति जाग उठी है - नेताओ समझ लो जान लो

दूसरा एंगल - युवा शक्ति जाग उठी है - नेताओ समझ लो जान लो
बलात्कार की राजधानी माफ़ करना देश की राजधानी दिल्ली में युवा शक्ति  ने स्वचेतन हो जिस तरह से अमानवीय शर्मनाक घटना के विरोध में सुबह से एकत्रित होना शुरू किया तो उनके संग हर उम्र का जुड़ना शुरू हो गया।
दुखद शर्मनाक घटना का विरोध स्वाभाविक था  मगर सत्ता हो या विरोधी पक्ष किसी भी दल के नेताओ ने सोचा भी नहीं होगा की ऐसा एतिहासिक विरोध प्रदर्शन इण्डिया गेट , विजय चौक से लेकर रायसीना हिल्स, राष्ट्रपति भवन तक दिखाई देगा। युवा शक्ति की इस जागरूकता को नमन। यह तो था दिल्ली का नजारा। संख्या में कम मगर विरोध का यह आलम देश के हर कोने में चल रहा है। यह अपने  आप में एक शुभ संकेत है।

आज वर्ष का सबसे छोटा दिन भारत के इतिहास में इक बड़ी घटना के नाते दर्ज हो जायेगा - इस देश को अब जागने वाले युवाओ की कतार मिल गई है। अब लगता है कि  सोई जनता का जमाना जाने लगा है .बिना नेताओ के अब जनता इकजुट  होने लगी है। यह उस युवा शक्ति का समूह था जिसे हांकने वाला कोई आका नहीं था। उसके हाथ में किसी ब्रांड का झंडा नहीं था। देश की कानून व्यवस्था का मखौल देश के हर कोने में नजर आता है . कानून की परिभाषा अपने हिसाब से देने वालो के विरोध में नेत्रत्व  विहीन यह युवा शक्ति पहली बार संगठित हुई है।

कई बार झड़प,आंसू गैस के गोले और लाठियों की गर्माहट से भी सबको दो चार होना पड़ा मगर हिम्मत में कोई कमी नहीं आई।
विरोध के इस उबाल को दोपहर तक एक जलसा समझ रहे गृहमंत्री को आखिर सूरज ढलने के साथ साथ समझ  आने लगा की अब कुछ करना होगा तब वे प्रधानमंत्री से एक घंटे से भी अधिक समय तक इस मसले के हल के लिए मिले। कुछ राजनितिक घोषणा हो जाएगी विरोध के इस ज्वालामुखी को शांत करने के लिए।

मगर आज में खुश हूँ की भारत माता  की युवा शक्ति अब वाकई जाग गई  है और शायद वर्ष की सबसे बड़ी रात देश के राजनेताओं की नींद उड़ा गई है।
 स्वामी विवेकानंद ने कहा वो दोहरा रहा हूँ - उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये.
भारत माँ के परम वैभव को पुन्ह प्राप्त करने इस हेतु इस युवा शक्ति को अब जागृत रहना होगा। अभी हाल ही में विवेकानन्द शार्ध शती समारोह युवा सम्मेलन में मुख्य वक्ता मनमोहन जी वैध्य के उद्बोधन के  अंश का उल्लेख करना चाहूँगा --" भारत के युवा को   कुछ ऐसा करना चाहिए की अन्यो को भी अपने कुछ करने से आनंद आये, तभी अपना जीवन सार्थक होगा। उन्होंने युवाओं के सामने चार सूत्रों को अपनाने का आव्हान किया| ये सूत्र है- 1. भारत को मानो, 2. भारत को जानो, 3. भारत के बनो और 4. भारत को बनाओ | हमारा राष्ट्र प्राचीनतम है। हमें इस गौरव को जानना होगा और अगर नहीं जानते है तो हमें अपने प्राचीन इतिहास को पढना होगा, जानना होगा।" 

Sunday, December 9, 2012

तृप्ती के संग परिणय बंधन दिवस के शुभावसर पर समर्पित

 तृप्ती  के संग परिणय बंधन दिवस के शुभावसर पर समर्पित

हसीन सपने संजोये जो हमने
खुदा ने तुम्हे हकीकत बना भेजा

जी रहे थे हम पतझर में जैसे तैसे
तुम्हे फूलों  का गुलिस्ता बना भेजा

हवा के झोंके भी कहाँ  थे, लगा  कि  अब दम निकलेगा
उसने तो तुम्हे मधुर बहार बना भेजा

जीने की ललक भी नहीं बची थी दिल में 
खुदा ने तुम्हे मेरी दिलरुबा बना भेजा

जी रहा हूँ मैं, चहक रहा हूँ मैं , महक रहा हूँ मैं
तृप्ति से मिल रही है  तृप्ति  की, जिए जा रहा हूँ मैं

Monday, November 12, 2012

उल्लू ...........



उल्लू 
तुम वाकई उल्लू ही हो 

मैं मुगालते में था  कि 
रात तुम्हे फुटपाथ पर सोते आदमी दिखते  होंगे 
मुझे लगता था की 
रात को भूखे पेट  बिलखते बच्चे नज़र आते होंगे 
मैं सोचता था कि 
रात तुझे करवट बदलती माँ नज़र आती होगी 
मुझे लगता था कि 
रात बारिश को तकते किसान नज़र आते होंगे 
मुझे ख्याल था कि 
कल की मजदूरी की चिन्ता में सो नहीं पाने 

वाला मजदुर नज़र आता होगा 

उल्लू तुम वाकई, उल्लू  तो नहीं हो 
उल्लू तो तुमने हमें बना रखा है 

तभी तो लक्ष्मी को लेकर
सफेदपोश की और जाते हो तुम 
बड़ी कोठिया ही नजर आती है तुम्हे 

उल्लू तुम्हे भी अब उसी नज़र का चस्मा लगा है 
जिस नेता की नज़र मेरे  देश पर लगी  है 

उल्लू तुम अपना उल्लू सीधा कर रहे हो 
और देश के ठेकेदार अपना उल्लू सीधा करने में लगे है 

Thursday, November 1, 2012

तसल्ली से जीने के लिए ............


हमें इंतजार तो था आपका, राह  देख रहे थे हम
राह से गुजरे कई लोग उनमे आपको  ढूंढ़ रहे थे हम

शाम जो  ढलने लगी पंछी भी घरोंदे की और उड़ने लगे
हम तो राह  में ही अटके और दुसरे अब हमें घूरने लगे

दिन में ही  इतने तन्हा थे हम की रात से डर  लगने लगा
बिस्तर की सिलवटो का ख्याल अब दिल में आने लगा

इक प्यार भरी नज़र ही काफी है आपकी, दिल के सकून के लिए
दे इस तन्हा  जिन्दगी को इक मुसकराहट तसल्ली से जीने के लिए