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Sunday, March 24, 2013

राजनीति का राज

राजनीति का राज
खलनायक का  साथ देकर अब सब राजनीति के नायक बनना चाह  रहे है कई नेता . राजनीति का राज आज तक तक कोई समझा है  भला ? नीति  को तो दूर तलक कोई लेना देना है ही नहीं राजनीति में . राजनीति के राज में मूल जनता ही है मगर जनता को तो भनक ही नहीं  लग पाती  की उसके लिए ही सब कुछ हो रहा है ? देश के कुछेक बुद्धिजीवीयों ने कुछ टी वी चेनलो से तो कुछेक टी वी चेनलो ने बुद्धिजीवियों से दोस्ती की सांठ गाँठ कर रखी हैं ? मुद्दा कोई हो एक्सपर्ट व्यू बहस लाइव शुरू हो जाती है सवेरे सवेरे से और तब तक चलती रहती है जब तक नई  बहस का मुद्दा हाथ न आये.  टी आर पी के लिए भी राजनीति। कौन अछूता  है भला राजनीति  से और  रह भी कैसे रह सकता है कोई ?
संजू दादा को आर्म्स एक्ट के चक्कर में सजा क्या हुई देश में भूचाल आ गया . सजा माफ़ी के लिए एक सुर होने लगे है सभी . क्या तो कांग्रेसी और बॉलीवुड की जमात साथ है ही, कुछेक बुद्धिजीवी भी, सभी के पास सहानुभूति की दलीले है. बॉलीवुड की तो समझ में आ रही है इनके धंधे पर सीधा सीधा असर होता है. आज संजू बाबा के कारन तो कल हो सकता है सल्लू के हिट  न रन केस में या फिर जोधपुर के हिरन के मामले में लोचा होने पर धंधे पर असर पड़ना लाजिमी है. बॉलीवुड की इकोनॉमिक कैलकुलेशन गड़बड़ाती है।  मगर देश, कांग्रेस और उसके नेताओं की चिंता का ब्लड प्रेशर यकायक कैसे बढ़ गया अपुन को समझ न आया . समझ में आएगा भला कैसे,  अपुन राजनीति के दलदल में  पैर भी रखा न कभी .
दलगत राजनीति से ऊपर है अपुन के संजू बाबा का मसला।  समाजवादी से जया बच्चन तो भाजपा से शॉटगन भी माफ़ी के हिमायती है. बहुत अच्छा है दलगत राजनीती से ऊपर उठना मगर इसमें भी राजनीति .वाकई राष्ट्र हित मे  जिन मसलो पर ऊपर उठना  हो उसमे तो फिर राज ही रह जाता है नीति  तो नजर ही नहीं आती .
न्याय पालिका अपना काम कर रही है और उसमे राजनीती के दखल का राज समझ से परे है. 
अपुन को बस इतना समझ में आ रहा है की अगर कभी जिन्दगी में संकट आ जाये तो उससे मुक्त होने के लिए अपुन का राजनीति के ठेकेदारों से सजीव सम्बन्ध होने आवश्यक है , अब यह कैसे बनेंगे वह  तो राज ही है उसको समझने की जुगत में अब लग ही जाता हूँ . 

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