Sunday, June 5, 2011

क्यों आई यह रात रामलीला मैदान में ?

सवेरे रेलवे स्टेशन  पर पांच रूपये में तीन समाचार पत्र एक हाकर ने  लेने का दबाव पूर्ण आग्रह किया उसके आग्रह को टाल नहीं सका क्योंकि सवेरे सवेरे समाचार पढने की भूख को तृप्त तो करना ही था.  
स्तब्ध था में रुक सा गया इक बार . आश्चर्य भी हुआ अटपटा भी लगा . लगा की सही कहते है हम सब कि "इस देश का मालिक तो भगवन राम ही है, ऐसा ही चलेगा इस देश में ".
तो फिर क्यों उस रात राम गायब हुए रामलीला मैदान से. क्यों परिवर्तित  हो गया वो "रावण लीला " मैदान में. ऐसा क्या हुआ कि देश के ठेकेदारों को मध्य रात्रि में निरीह अहिंसक सत्याग्रहियों कि ऐसी कि तैसी करने रक्षको को भक्षक बना भेजा . ऐसा तांडव करने कि आखिर कोई वजह तो होनी चाहिए न . तानाशाह प्रवर्ती कि इस हरकत से दिल मानो दहल गया. माँ भारती के इस देश में माताओ बहिनों और अन्यो के साथ बर्बरता पूर्ण व्यवहार उचित तो नहीं ठराया जा सकता है. 

बाबा कि इक चिट्ठी से गड़बड़ हुआ आन्दोलन , बाबा का बेक फुट पर आना उससे ही सरकार अपना गेम प्लान पूरा कर सकती थी . मगर किन कारणों से सरकार में बैठे मंत्रियों ने  सरकार को ही बेक फुट पर ला खड़ा किया . सरकार कि इस बर्बरपुर्वक कार्यवाही से तो स्वंय ही कठघरे में आ खड़ी हुई है ?  

देश के गृह मंत्री जी आपकी नाक के निचे ही ऐसा हो रहा है कहाँ है आप ? क्या कारण रहे क्या बतला पाएंगे आप. 
 जिस जन सामान्य की चिंता कुछ लोगो को सता रही है  उसकी खुद की नैतिक जिमेदारी क्या है ? उसको खुद इस आन्दोलन का सक्रीय हिस्सा नहीं होना चाहिए क्या ? राष्ट्रवादी संघटन अपना कर्तव्य निभा रहे है मगर हिंदुस्तान का जन सामान्य दूर खड़ा रह कर देखता है। जन सामान्य को राष्ट्रवादी संघटनो के आन्दोलन में सक्रीय सहभागी बनना होगा । कल अन्ना हजारे ने प्रेस कांफ्रेंस में सही तो कहा था भारत के काले अंग्रेजो ने मध्यरात्रि में अहिंसक सत्याग्रहियों पर दमन किया ।
कितने लोगो ने कल के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया ? किस जन सामान्य की बात कर रहे है जिसे किसी से कोई सरोकार नहीं ? वह जन सामान्य जो सिर्फ अपने स्वंय तक ही केन्द्रित है ।
कांग्रेस जन सामान्य के इस भाव को अच्छी तरह जानती है इसलिए जन सामान्य को अपने हिसाब (जैसा रामलीला मैदान में किया)  से हांक रही है और हांकती रहेगी । 

देश के मुद्दों को कोई अगर उठाता है तो उससे किसी को कोई परेशानी क्यों और उस मुद्दे पर अगर कोई संघटन समर्थन दे तो गलत क्या है ? बाबा के इस मुद्दे पर कुछ राजनितिक पार्टियों ने समर्थन दिया तो उसका इस्तकबाल करना चाहिए कुछ राष्ट्रवादी संघटनो ने समर्थन किया तो साम्प्रदायिक ताकतों के द्वारा समर्थित बताना तो लाजिमी नहीं है न . 

सोच बदलना होगा सोच . पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर सिर्फ राजनितिक नफा नुकसान तक ही सिमित रह कर केंद्र सरकार को कार्य नहीं करना है . वरन देश में देश की जनता द्वारा  राष्ट्र हित में सुझाये गए मुद्दों पर भी पूर्ण सकारात्मक द्रष्टिकोण रखना होगा इस देश के हुक्मरानों को. 

अपुन के देश की कुंडली अभी ठीक नहीं लगती . राहू, केतु अथवा शनि किस मंत्रालय में बैठ कर किस किस को नीच द्रष्टि से देख रहे है  , कब बुरा समय ला दे कुछ कह नहीं सकते . कब आग लग जाये घर के चिराग से मालूम नहीं. 

तीस्ता जी आप कहा है अभी , राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग किधर खो गया है इस देश का ?  क्यों वो भयावह रात आई इस देश में जो सब कुछ उठा ले गई ...... और छोड़ गई कई अनुतरित प्रश्न .....?

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