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Tuesday, April 6, 2010

चिदंबरम जी आख़िर यूँही कब तक चलेगा सिलसिला हमारे जवानों को शहीद बनाने का

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नृशंस नक्सली हमले में ८० से भी ज्यादा केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों के शहीद होने की ख़बर ने पुरे राष्ट्र को चोंका दिया। आख़िर कहाँ हैं हमारी माकूल सुरक्षा व्यवस्था ? यह नर संहार सरकार की निति रीती को स्पष्ट करती है कि सौ प्रतिशत सरकार कि निति सही नही रही हैं - "ऑपरेशन ग्रीन हंट" में । सेना को शामिल न करना कही भारी भूल तो नही थी ? अब भी समय है ऑपरेशन ग्रीन हंट की समीक्षा करने की। और तो और प्राथमिकता से नक्सली चुनौती का सामना करना एक लक्ष्य होना चाहिए सरकार का । नक्सली इलाको की भोगोलिक जानकारी को देखते हुए लगता है की वायुसेना की सहायता लेना भी लाजिमी होगा।



राष्ट्र की सुरक्षा में लगे जवानों को नक्सली गोलियों से आख़िर कब निजात मिलेगी ? सरकार भी मानती हैं कि नक्सली हथियारों की फैक्टरी चला रहे हैं, जो छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के सुदूरवर्ती इलाकों में हैं। गृह राज्यमंत्री अजय माकन ने हरिश्चंद्र चव्हाण के सवाल के लिखित जवाब में लोकसभा को बताया था कि भाकपा (माओवादी) हथियारों की फैक्टरियां भी चलाते हैं, जहां देशी हथियारों का निर्माण होता है। उन्होंने बताया था कि नक्सलियों के पास उपलध अधिकांश विदेश निर्मित हथियार सुरक्षाबलों से लूटे गए हैं। तो सरकार कब रोकेगी इन माओवादियों के हथियारों की फक्ट्रियां ? क्या शहीदो की और भी तादाद बढ़नी है सरकार को ?



इसे सिर्फ़ नक्सली हमला मानना एक बहुत बड़ी भूल होगी दरअसल यह समाज और सरकार के लिए इक चेतावनी हैं। राजनीती के नफा नुकसान की गणित किए बगैर दृढ़ संकल्प से राष्ट्र हित में राष्ट्र के लिए सोचने की इच्छा शक्ति जिस दिन हमारी सरकार में आ जाएगी उस दिन समझो सारी समस्याएँ स्वत: समाप्त हो जाएगी ।



हाँ एक और अब वे सब मानवाधिकार के ठेकेदार कहाँ गए जो फरवरी माह में कोबाड़ गाँधी के गिरफ्तारी का विरोध करने दिल्ली आए थे । इन्ही कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ऑपरेशन ग्रीन हंट को खत्म करने की माँग की थी। अब ये बगले झांक रहे होंगे ।



एक और विषय जिसको दरकिनार नही किया जा सकता कि आख़िर कैसे नक्सलियों को जानकारी मिली ? कही कोई भेदिया तो नही है इस तंत्र में कि नक्सलियों ने एक हज़ार से भी ज्यादा की तादाद में इक्कठे होकर जवानों पर हमला किया ?



नम आँखों से श्रदांजलि देना ही हमारा कर्तव्य नही है समस्या के मूल में जाकर उससे सही तरीके से निबटना जरुरी है ताकि हमारे जवान कम शहीद हो और दुश्मन अधिक ढेर हो ।

4 comments:

  1. आप जिन लोगों की बात कर रहें हैं उनमे से एक अरूंधति तो बस्तर जाकर सात दिनों का नक्सलियों की मेहमाननवाज़ी का आनंद ले चुकी है और बदले में उनकी तारीफ़ मे एक लेख भी लिख कर छपवा चुकी हैं।ये नही जलायेंगे मोमबत्ती अब।विदेशी फ़ंड पर मौज़ करने वाले इस देश मे मानवाधिकार की जब बात करते हैं तो बहुत गुस्सा आता है।

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  2. "इसे सिर्फ़ नक्सली हमला मानना एक बहुत बड़ी भूल होगी दरअसल यह समाज और सरकार के लिए इक चेतावनी हैं। राजनीती के नफा नुकसान की गणित किए बगैर दृढ़ संकल्प से राष्ट्र हित में राष्ट्र के लिए सोचने की इच्छा शक्ति जिस दिन हमारी सरकार में आ जाएगी उस दिन समझो सारी समस्याएँ स्वत: समाप्त हो जाएगी ।"

    इसके बाद भी राजनैतिक इच्‍छाशक्ति सोई है, क्‍या कहें.

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  3. "नम आँखों से श्रदांजलि देना ही हमारा कर्तव्य नही है समस्या के मूल में जाकर उससे सही तरीके से निबटना जरुरी है ताकि हमारे जवान कम शहीद हो और दुश्मन अधिक ढेर हो ।"

    bahut badhiya bataaya hai ji...

    kunwar ji,

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